मंगलवार 12 मई 2026 - 22:09
आज की जंग, मोमिनीन को मुनाफिकीन की पंक्ति से अलग कर देती है

हज़रत मासूमा (स) की पवित्र दरगाह में खिताब करते हुए हुज्जतुल-इस्लाम मोहसिन दादसरश्त तेहरानी ने कहा कि आज की जंग मोमिनों को मुनाफिकों से अलग करने के लिए एक मानदंड बन चुकी है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हज़रत मासूमा (स) की पवित्र दरगाह में खिताब करते हुए हुज्जतुल-इस्लाम मोहसिन दादसरश्त तेहरानी ने कहा कि आज की जंग मोमिनों को मुनाफिकों से अलग करने के लिए एक मानदंड बन चुकी है।

उन्होंने इमाम सादिक (अ) की हदीस का हवाला देते हुए कहा कि हज़रत ने तीन बार कसम खाकर फरमाया: "तुम लोग इस तरह छान्टे जाओगे कि कुछ थोड़े से लोग ही बाकी रह जाएंगे।"

दादसरश्त तेहरानी ने अमीरुल मोमिनीन (अ) के खुतबा नंबर 16 नहजुल बलाग़ा का हवाला देते हुए कहा कि आप उन तजमुआत (समूहों) में देखते हैं कि कुछ लोग गैर-इन्क़िलाबी ज़ाहिरात (रूप) के साथ आ रहे हैं, जबकि कुछ कल के इन्क़िलाबी आज अमेरिका की पंक्ति में खड़े हैं। कुछ लोग अमेरिका और यूरोप को छोड़कर ईरान पहुँच गए हैं ताकि जबहे-हक (सत्य के मोर्चे) में शामिल हो सकें।

उन्होंने सभी फ़ुक़हा-ए-एज़ाम के फतवों का हवाला देते हुए कहा कि यदि इस्लामी देश पर काफ़िरों का हमला हो जाए तो सभी मुसलमानों पर उसका बचाव करना वाजिब है। यह बचाव औरतों पर भी फर्ज़ है। सड़कों पर निकलना और तजमुआत (प्रदर्शनों) में शामिल होना देश की रक्षा की सबसे बड़ी निशानी है।

उनका कहना था कि यदि सब्र और तक़्वा इख्तियार करोगे तो खुदा ने वादा किया है कि दुश्मन की कोई चाल तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकेगी। तक़्वा की दो क़िस्में हैं: इन्फ़िरादी तक़्वा (व्यक्तिगत संयम) और सियासी तक़्वा (राजनीतिक संयम)। सियासी तक़्वा का मतलब है वली-ए-फ़क़ीह की इताअत (आज्ञाकारिता) करना।

उन्होंने कहा कि खुदा ने वादा किया है कि वह अपने फ़रिश्तों को तुम्हारी मदद के लिए भेजेगा। तुम्हारे रॉकेटों को फ़रिश्ते तेल अवीव और हैफ़ा तक पहुँचाएंगे।

उनका कहना था कि हज़रत इमाम रज़ा (अ) की ज़ियारत का कम से कम सवाब सत्तर हज-ए-मक़बूल है, जो सत्तर हज़ार हज तक जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि इमाम जवाद (अ) ने फरमाया कि वालिद-ए-बुज़ुर्गवार (इमाम रज़ा (अ)) की ज़ियारत इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत से अफज़ल है, क्योंकि इमाम हुसैन (अ) को अलग-अलग संस्कृतियों और मज़हबों के लोग ज़ियारत करते हैं, लेकिन इमाम रज़ा (अ) की ज़ियारत केवल शिया-ए-इस्ना-अशरिया करते हैं, जो मज़हब-ए-हक (सत्य धर्म) होने का प्रमाण है।

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